{"product_id":"9781807155148","title":"ध्यानमग्न","description":"ये रचना संजीव के , जीवन को उसकी यथास्थिति में देखने का सहज प्रयास भर है फिर चाहें वो प्रकृति हो रिश्ते हों उनकी कमियां हों खूबियां हों ।\nजीवन किस तरह किन किन चेहरों से अपनी ऊर्जा प्रकट करता है । कैसे वो तमाम सफलताओं और नाकामियों के बावजूद निरन्तरता रखता है और जैसे जैसे हम उसके इन रंगों को समझने लगते हैं वो हर  छोटी बड़ी सजीव निर्जीव वस्तु में प्राण फूंक देता है\nफिर हर एक शय को ज़बाँ मिल जाती है और वो आपके करीब बैठ कर अपने किस्से आपको सुनाए जाती है आप बस उनकी ज़बान में उनको रक़म करने का  माद्दा भर रख सकते हो ।\nये याराने इतने गहरे हो जाते हैं कि आपको तन्हां देखा और वो आपके बाजू में आ बैठते हैं कभी गुदगुदाकर कभी मुस्कुराकर कभी गीली पलकों की शम्मे सजाकर ।","brand":"Sanjeev Raajsingh parmar","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43026411126855,"sku":"9781807155148","price":16.0,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0693\/9879\/0215\/files\/9781807155148_front.jpg?v=1785490584","url":"https:\/\/books.bookleafpub.com\/products\/9781807155148","provider":"BookLeaf Bookstore International","version":"1.0","type":"link"}