{"product_id":"9789369531295","title":"मुखर मौन","description":"अक्सर हमारी बातों का अर्थ, बातों की शाब्दिकता से कहीं ज्यादा सामने वाले की मानसिकता\/मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। फिर प्रतिक्रिया, यदि आपकी अपेक्षा के विपरीत हुईं और इतनी विपरीत हुईं कि उसमें उपेक्षा की बू आने लगे, तो आप एक लंबी त्रासदी से गुजरने को बाध्य होते हैं। फलत: आप धीरे-धीरे एक मौन ओढ़ लेते हैं। मौन के उस चादर के नीचे संवाद फिर भी जारी ही रहता है। हाँ, तब यह संवाद बहिर्मुखी न होकर अन्तर्मुखी हो जाता है।\n‘मुखर मौन’ ऐसे उन तमाम पलों का संकलन है जिनमें संवाद चला है और बेसाख्ता चला है पर बिना कोई शोर मचाए। मन की मौन बातें मन से हुई हैं जो रूपायित हैं शब्दों में। आप चाहें तो इसे कविता का नाम दे सकते हैं। \n\n\n\n","brand":"विजय अग्रहरि 'आलोक'","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":43025856397383,"sku":"9789369531295","price":16.0,"currency_code":"USD","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0693\/9879\/0215\/files\/9789369531295_front.jpg?v=1785483306","url":"https:\/\/books.bookleafpub.com\/products\/9789369531295","provider":"BookLeaf Bookstore International","version":"1.0","type":"link"}