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“अगर, मगर और काश में हूँ”
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यह पुस्तक लेखक की उन कविताओं का संग्रह है, जो उसके आसपास घटते जीवन के दुःख, टूटन और असहज सच्चाइयों से जन्मी हैं। ये रचनाएँ शिकायत नहीं, स्वीकार हैं—जो जैसा है, उसे वैसा देखने का साहस। लेखक मानता है कि पीड़ा कोई अपवाद नहीं, बल्कि जीवन की एक स्थायी लय है। उसकी कविताएँ समाधान नहीं देतीं, बस साथ बैठती हैं। वे कहती नहीं कि सब ठीक हो जाएगा, बल्कि यह स्वीकार करती हैं कि सब कुछ वैसा ही है। यहीं से शांति शुरू होती है।
SKU:9789375107866
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