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प्लस माइनस....

प्लस माइनस....

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यह मजमूआ एहसासात, तजुर्बात और जज़्बात की एक दिलनशीं दास्तान है। इसमें शामिल ग़ज़लें और नज़्में ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ पहलुओं को बड़ी नफ़ासत, रवानी और असर के साथ बयाँ करती हैं—कभी सियासत की तल्ख़ हक़ीक़त, कभी वतन की मोहब्बत, और कभी इंसान के दिल में छुपी तन्हाई की ख़ामोश आहट। इन तहरीरों में “हिटलर” के ज़रिये ताक़त और ज़ुल्म का आईना नुमायाँ होता है, तो “गिलगमेश” के बहाने इंसानी फ़ितरत, दोस्ती और वजूद की तलाश का ज़िक्र भी बेहद ख़ूबसूरती से किया गया है। “गुएर्निका” और “द परसिस्टेंट ऑफ़ मेमोरी” जैसी फ़नकाराना झलकियों के ज़रिये दर्द, वक़्त और यादों की तह-दर-तह परतें खुलती चली जाती हैं। यह किताब मोहब्बत, सियासत, इंसानियत और ज़िंदगी के छोटे-बड़े लम्हों को एक ख़ूबसूरत सिलसिले में पिरोती है—जहाँ हर

SKU:9789375434023

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