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मैं सर्प हूँ, पर स्निग्ध भी

मैं सर्प हूँ, पर स्निग्ध भी

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"मैं सर्प हूँ, पर स्निग्ध भी" समकालीन हिंदी कविता के उभरते हुए रचनाकार 'द्रवित' का प्रथम काव्य-संग्रह है। इस संग्रह में शामिल 21 रचनाएँ पाठकों को भावनाओं की एक सघन यात्रा पर ले जाती हैं, जहाँ जीवन दर्शन, प्रेम, विरह और सामाजिक सरोकार का अनूठा समन्वय देखने को मिलता है।

SKU:9798900818238

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